00:00आज के इस खास जायजे में हम जनुबी एशिया की एक इंतिहाई शांदार और जानी पहचानी यादगार की बात करने
00:07वाले हैं, मिनारे पाकिस्तान.
00:08बजाहर तो हम सब इसे जानते हैं
00:10लेकिन आज हम इसकी वो छुपी हुई हिस्ट्री और राज डीकोड करेंगे
00:14जो सच में बहुत कम लोगों को मालूम है
00:16तो चले सीधा अपने मौज़ों के तरफ चलते हैं
00:33जो आम तोर पर नजरों से ओजल रहते हैं
00:36अब थोड़ा सा पसे मनजर देख लेते हैं
00:38ये अजीम औशान धाचा लाहॉर के तारीखी इकबाल पार्क में वाकिया है
00:42जिसे पहले मिंटो पार्क कहते थे
00:44और ये 23 मार्च 1940 की करारदाद लाहॉर की याद में बनाय गया था
00:49ये तारीख तो सबको याद ही होगी
00:50ये वही दिन था जब जब जनूबी एशिया के मुसल्मानों के लिए
00:54एक अलग वतन का पहला बकाइदा मुतालबा किया गया था
01:11अगर हम इसे बुलंदी से यानि इसका एरियल व्यू देखें
01:14तो एक बिलकुल ही नया और जबरदस्त मनजर सामने आता है
01:17उपर से देखने पर ये एक ऐसा जोमेट्रिक फूल लगता है
01:20जो एक पांच कोनों वाले सितारे पर खिला हुआ है
01:23और उसके इर्द गिर्द दो बहुत बड़े हिलाल यानि चांद बने वे हैं
01:27अब ये कोई इतिफाक नहीं है
01:28ये एक बहुत ही सोची समझी डिजाइनिंग है
01:31इसकी जोमेट्रिक के पीछे छुपी सोच वाकई कमाल है
01:34ये जो दो हिलाल नजर आ रहे हैं न
01:36ये दरसल मश्रिकी और मगरिबी पाकिस्तान की नुमाहिंदगी के लिए बनाये गए थे
01:40जैसे वो एक दूसरे से गले मिल रहे हूँ
01:41और गोर करें तो इन चांदों से निकलने वाली सीडियों की दो कतारें उपर जाकर एक ही जगा पर मिलती
01:47है
01:47ये इस बात के अलामत है कि इस नई कौम की तश्कील में मुल्क के दोनों हिस्सों ने बिलकुल यकसा
01:52रोहानी और जजबाती कुर्बानिया दी है
01:54बिलकुल वैसे जिसे काइद आजम का खाप था
01:57अब सवाल ये पैदा होता है कि इस कदर गहरी सोच और कौमियत के जजबे से भरा ये डिजाइन बनाया
02:03किसने था
02:03और यकीन माने इसका जबाब वाकई हैरान कुने
02:06आम तोर पर यही सोचा जाता है कि एक नई इसलामी रियासत की इतनी बड़ी और एहम अलामत है
02:12तो लाजमी किसी मशूर मकामी माहरे तामिरात नहीं से डिजाइन किया होगा
02:17लेकिन हकीकत में उसके मेमार की कहानी बहुत ही मुखतलिफ और दिल को चूलेने वाली है
02:22और यहां से इंट्री होती है नसर الدین मुराद खान की
02:26ये कोई आम कहानी नहीं है
02:28मुराद खान एक रूसी निजात कमेक मुसल्मान इंजीनियर थे
02:32जो 1904 में रूसी सल्तनत के इलाके दागस्तान में पैदा हुए
02:35जब जोज़फ स्टालिन के दौर में उनकी जान को खत्रा लहाग हुआ
02:39तो वो 1944 में जर्मनी फरार हो गए
02:41वहां महाजर केमपों की सखतियां जहली एक तुर्क महाजर खातून हामिदा अखमत से शादी की
02:47और फिर बिलाखिर 1950 में हिजरत करके पाकिस्तान आ गए
02:51उन्हें यहां एक महफूस ठिकाना मिला
02:53और फिर 1960 में उन्हें मिनारे पाकिस्तान डिजाइन करने का ये तारीखी प्रोजेक्ट सौपा गया
02:58इस प्रोजेक्ट की एहमियत का अंदाजा इस बात से लगाएं
03:01किसे आला तरीन हुकूमती सता की तवज्जो हासिल थी
03:041963 में उस वत के सदर अयूब खान ने मुराद खान को अपने दफ्तर बुलाया
03:08कहा जाता है कि उन्होंने अपनी जेब से एक फाउंटेन पहन निकाला
03:11उसे मेस पर बिल्कुल सीधा खड़ा किया और कहा
03:13मुझे इस तरह की एक इमारत बना कर दो
03:16वो चाहते थे कि ये यादगार इसी पैन की तरह सीधी और बुलंदियों को चूती हुई हो
03:20और मुराद खान ने इस विजन को इतनी खुबसूरती से हकीकत का रूप दिया
03:25कि उसका फाइनल डिजाइन खुद तहरीके आजादी के सफर का एक जीता जाकता इस्तारा बन गया
03:31इसे ज़रा समझीएगा मिनार के जो चार मुखतलिफ प्लैटफॉर्म्स हैं
03:35वो आजादी की जद्व जहद की बिल्कुल दुरुस्त अकासी करते हैं
03:38सबसे पहला प्लैटफॉर्म बगएर तराशे हुए खुरदरे टैक्सला के पत्रों से बना है
03:42जो इस जद्व जहद के मुश्किल तरीन और कठिन इप्तदाई दौर को जाहर करता है
03:47फिर दूसरा मरहला आता है जहां हथोड़े से तराशे गए पक्तर इस्तमाल हुए है
03:50फिर तीसरा मरहला छीनी से तराशे गए पत्रों का है
03:53और सबसे आखिर में चौथा प्लैटफॉर्म बिल्कुल पॉलिश किये हुए चमकदार सफेद संगे मरमर का है
03:59जो हत्मी काम्याबी और खुशाली की अलामत है
04:01कितना जबरदस्ट आइडिया है है ना
04:04जाहर है इतना बड़ा काम कोई रातों रातों नहीं हो सकता था
04:07इस सतर मीटर उंचे टावर को मुकमल होने में पूरे आठ साल लगे
04:111960 से 1968 तक
04:14इसकी चोटी तक पहुँचने के लिए 324 सीडियां बनाई गई
04:18लेकिन एक चीज जो और भी दिल्चस्प है वो इसकी फंडिंग का तरीका था
04:22इस पूरे प्रोजेट का खर्चा सिमेमा और घुर दौर के टिकेटों पर इजाफी टेक्स लगा कर पूरा किया गया
04:28मतलब पूरी कौम ने किसी ना किसी तरह इसकी तामीर में अपना हिस्सा डाला
04:33लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा ट्विस्ट है
04:35आज हम जो 70 मीटर का मिनार देखते हैं वो दरसल वैसा नहीं है जैसा मुराद खान ने असल में
04:42सोचा था
04:42मुराद खान इमारत के सबसे उपर गुमबद लगाने के बिलकुल खिलाफ थे
04:47उनका असल आइडिया ये था कि ये मिनार उपर जाते जाते बतद्रीच पतला हो और एक ला महदूद नुक्ते पर
04:54जाकर खत्म हो जाए
04:55क्यों? क्योंकि वो इस नई कौम की न खत्म होने वाली अमंगों और इरादों को दिखाना चाते थे
05:00उनका ख्याल था कि गुमबद लगा देने से इस यादगार की ग्रोथ रुक्सी जाएगी
05:04लेकिन खेर बाद में कमीटी ने फैसला किया कि इसके उपर एक गुमबद ही बनाया जाएगा
05:09गुमबद वाली बात के इलावा मुराद खान ने जान बूच कर इसे किसी रिवायती मकबरे या मस्जिद की शकल देने
05:16से गुरेस किया
05:17उनका वाज़ तोर पर ये मानना था कि चुँके पाकिस्तान आलम इसलाम में एक बिल्कुल नया और जुरत मंदाना तजर्बा
05:23है
05:23इसलिए इसका तरज तामीर भी नया होना चाहिए
05:26उन्होंने जदीद असरी खुतूत को मुगल तरज तामीर की खुबसूरती के साथ
05:30इस महारत से ब्लेंड किया कि एक शाकार बन गया
05:33अब इस सारी कहानी का सबसे खुबसूरत हिस्सा वो है
05:37जो पत्थरों और लोहे से नहीं बलके खालिस इनसानी जजबे से चुड़ाएं
05:41ये जो नंबर आपको नज़र आ रहा है
05:44दो लाक पचास हजार रुपए
05:45ये कोई मामूली रकम नहीं है
05:47ये वो फीस थी जो मुराद खान को इस प्रोजेक्ट पर
05:50सालों की मसलसल और ठका देने वाली मेहनत के वज मिलनी तैह हुई थी
05:55उस जमाने के हिसाब से ये एक बहुत ही खतीर रकम थी
05:58लेकिन यहां इनकी हुबलवतनी और एहसानमंदी का ऐसा कमाल नज़र आता है
06:04कि इनसान दंग रह जाए
06:05उन्होंने ये पूरी की पूरी रकम लेने से साफ इंकार कर दिया
06:09और इसे उसी तामीराती फंड में वापस अतिया कर दिया
06:12उनका कहना था कि ये उस मुलक का थोड़ा सा कर्द चुकाने की कोशिश है
06:17जिसने दरदर की ठोकरें खाने के बाद उन्हें एक महफूज घर दिया
06:21एक पहचान दी
06:22उन्होंने तो कोई माली मुआवजा कबूल नहीं किया
06:25लेकिन इस मुलक ने भी उनकी इस बेलोस खिदमत और लगन को फरामोश नहीं किया
06:291963 में इस वक्त के सदर ने
06:32इन्हें पाकिस्तान के बहुत बड़े सिवीले नैजाज तमगे इम्तियास से नवाजा
06:36एक महाजर की अपने नए वतन से महबबत का ये कितना शांदार सिला था
06:40तो इस सारे जाइजे के बाद ये कहानी एक बहुत ही गहरा सवाल छोड़ जाती है
06:46अगली बार जब हम आजादी की किसी ऐसी बुलंदो बाला इमारत को देखेंगे
06:50तो क्या हमें सिर्फ पत्थर, लोहा और संगे मरमर नजर आएगा
06:54या हम उस महाजर की रूह और उसके जजबे को भी महसूस कर सकेंगे
06:58जिसने उसे बनाया
06:59कौन जाने आजादी की इन बड़ी बड़ी अलामतों के पीछे
07:02जिलावतनी, शुक्र गुजारी और ना खत्म होने वाली अमंगों की
07:06और कितनी ही कहानिया खामोशी से छुपी बैठी हों
07:09जरा सोचिएगा जरूर
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