00:00खुशम देद इस नए एक्स्प्लेनर में, आज हम एक ऐसी कहानी में उतरने वाले हैं जो किसी दिल्चस्प फिल्म से
00:05कम नहीं, ये कहानी है पाकिस्तान में परफॉर्मिंग आर्ट्स के जवाल के बाद दोबारा जिन्दा होने की, बिल्कुल राख से
00:12उटने वाले किसी अज
00:26दोनों के सफर को समझते हैं, आज की इस एक्स्प्लेनर को हमने पांच हिस्सों में बाटा है, पहला पाकिस्तानी थेटर
00:33का जवाल, दूसरा नापा का इनकलाब, तीसरा पफॉर्मिंग आर्ट्स को बाजापता बनाना, चौथा तारीखी हिंदु जिम खाना, और आखरी ए
00:56का आइना हुआ करता था, थेटर, समाज की सियासत, मजा और जजबात की बिलकुल वक्त के मताबक अकासी करता था,
01:03लेकिन 1980 की दहाई तक आते आते ये मनजर नामा काफी तखसीम हो चुका था, एक तरफ अपना लहौर था,
01:10जो अपने तेज, मजाहिया और बहुत ही कामया�
01:13पंजाबी स्टेज प्रोडक्शन के लिए मशूर था, वहाँ एनरजी थी, और दूसरी तरफ कराची था, जहां का थेटर थोड़ा अदबी,
01:20संजीदा और तजरबाती था, कराची में सियासी और मौाशिरती मसाइल, नसब और तपकाती कश्मकश पर प्लेज होते थे, ब�
01:39प्लेजा, फंडिंग की कमी, केबल टीवी का अरूज, और सख्त सेंसर्शिप, इन सब ने मिलकर थेटर को खत्मे के दहाने
01:47पर लाखड़ा किया, पोशीदा सियासी दबाओं के तहत ऐसी पाबंदिया लगीं कि फंकार वसाइल की कमी से तंग आकर टीवी
01:53की तरफ भागने �
01:54लगे, लग रहा था बस अब ये फंखतम, लेकिन फिर एक बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट आया, जिसने सब बदल दिया,
02:00और ये टर्निंग पॉइंट था, हमारा दूसरा हिस्सा, नैपा का इनकलाब, 2004-2005 की दोरा, National Academy of Performing Arts,
02:10यानि नापा काइम हुई, ये मुलकी सब
02:12से पहली proper, बकाइदा Performing Arts Conservatoire थी, और उन्होंने आते ही सदियों पुराने रवायतों को बिलकुल बदल कर रख
02:19दिया, पहले अदाकारी में क्या होता था, बहुत ज़दा मुबालगा और बस उंची आवाज, नापा ने अदाकारों को सिखाया कि
02:26भाई, आवाज के उतार च�
02:40के जरीए, उन्होंने आलमी एस्थेटिक्स को हमारी देसी कहानियों के साथ इतने शांदार तरीके से जोड़ा, कि देखने वाले दंग
02:46रह गए, और जहां तक टेक्निकी चीज़ें बदली, वहीं कहानिया सुनाने का अंदास भी में चुर हुआ, नैपा की वज़ह
02:53से नए
02:53कहानिकार सामने आये, और अचानक से स्टेज दुबारा एक ऐसा पावफुल प्लाटफॉर्म बन गया, जहां उन मसायल पर खुल कर
02:59बात होने लगी, जिनने पहले बिल्कुल टैबू समझा जाता था, शनाख्त का बोहरान, औरतों के हुकूख, जेनरेशन गैप, यहां तक
03:06के शहरी तनहाई, नौजवानों के इन मसायल को नहायत खुबसूरती से स्टेज पर जिन्दा किया गया, अब जब हम इस
03:12इनकिलाब की बात करते हैं, तो लेट जिया मुएद्दीन साब का जिकर किये बिना कहानी आगे नहीं बढ़ सकती, वो
03:17नैपा के बानी प्रेजिडं�
03:19इमेरिटिस थे, 1931 से लेकर 2023 तक उनकी पूरी जिन्दगी फन के नाम रही, नैपा ने अपने खिराजे तहसीन में
03:26ठीकी तो कहा है कि उनका बसीरत अफ्रोज जजबा हर सुर और मिसरा में हमेशा गूंचता रहेगा, असल में असातिज़ा
03:33और तुलबा के अंदर इस आला म
03:34प्यार की बुन्याद उन्होंने ही रखी थी, तीसरा हिसा, परफॉर्मिंग आर्ट्स को बाजापता बनाना, यानि उसे एक मुकमल फॉर्मल शकल
03:42देना, दिखें नापा ने सिर्फ थेटर पे काम नहीं किया, बलके पाकिस्तान में मौसिकी को भी रिवायती घरानों के सा�
03:48एक प्रॉपर जदीद academic structure दिया, इनका music diploma कोई मामुली बात नहीं है, ये पूरे तीन साल पर मुहित
03:55है, जिसमें 9 intensive trimesters शामिल हैं, इस शांदार सफर में तुल्बा को सिर्फ सास पकड़ कर बजाना ही नहीं
04:02सिखाया जाता, बलके उन्हें music theory और practical दोनों की ऐसी सخت training दी जाती
04:18यहां पेशावर उस्तादों की निगरानी में क्या कुछ नहीं सिखाया जाता, vocals हों, तबला, बासुरी, सरंगी या सितार, यहां तक
04:27के प्यानों और गिटार बजाने की भी आला और बाकाइदा तालीम मिलती है
04:31और इनकी कोशिश हैं यहां खतम नहीं होती, अपनी सकाफत को आगे तक महफूज करने के लिए, उन्होंने मुसीकी पर
04:37अपनी पहली publication, SM शाहिद के किताब Great Masters शाया की
04:41उसके साथ ही अवाम के लिए Gallery of the Greats के नाम से एक Art Gallery भी खोली, वहां Fine
04:47Artist शरजील बलोच के हाथ से बनाये गए, मुसीकी के अजीम उस्तादों के इतने खुबसूरत पोट्रेट्स हैं कि इनसान बस
04:53देखता ही रह जाए
04:54चौथा हिस्सा, तारीखी हिंदू जिम्खाना
04:57अब हम आते हैं उस फिजिकल जगा पर जहां ये सब कुछ हो रहा है
05:02इस सारे फन और तालीम का गोंसला है
05:05कराची के सरवर शहीद रोड पर वाके कोलोनियल दौर की ये शांदार इमारत
05:10हिंदू जिम्खाना
05:111925 में सेठ राम गोपाल गौरदानंद मोहत्ता और हिंदू कम्यूनिटी ने इसे कायम किया था
05:17इसे मारूफ आर्किटेक्ट आगा एहमद हुसेन ने डिजाइन किया
05:21और ये कराची की पहली इमारत थी जिसमें मुगल रिवाइवल तरजे तामीर अपनाया गया
05:26अगर आप घौर करें न तो इसका डिजाइन आगरा में मौजूद 1628 के एतमाद उद दौला के मकबरे से बेहत
05:34मुतास्सिर लगता है
05:34इसकी फन्ने तामीर की डीटेल सुनेंगे तो आप वाकई हैरान रह जाएंगे
05:39इसमें बीजापूर से स्पेशली मंगवाई गई दो फिट मोटी दीवारे हैं
05:44इसकी ढलवान बंगलादार छद बिलकुल मोगल बाच्चा अकबर के फतेपूर सिकरी की याद दिलाती है
05:49कोनों में आठ कोनों वाली मिनारे हैं जिन पर राजिस्तानी तर्सकुक छत्रियां बनी है
05:54मुकामी गिजरी पत्थर और जोदपूर पत्थर की ऐसी नफी सकुन्दा कारी हुई है कि बस
05:59यही वज़ा है कि ये सिंध कल्चुरल हेरिटेज प्रोटेक्शन एक के तहट एक मैफूस तारीखी विर्सा करार दी गई
06:06लेकिन पांचमा हिस्सा एक मुतनाजा तारीखी विर्सा
06:10हर खुबसूरत चीज के साथ थोड़ी पैचीदगियां लाजमी जुड़ी होती है
06:14जहां ये इमारत इतने खुबसूरत और तारीखी एहमियत की हामिल है
06:18वहीं इसकी जमीनी मालकियत की कहानी काफी उलजी भी है
06:22एक हकीकत सुनें
06:231925 में जब ये जिमखाना बना था
06:26तो ये पूरी जगा तकरीबन 47,000 स्क्वेर यार्ड्स थी
06:29और आज आज ये सुकड़कर सिर्फ 4,500 स्क्वेर यार्ड्स रह गई है
06:34सोचें कहां 47,000 और कहां सिर्फ 4,500
06:38तो सवाल ये है कि बाकी जमीन आखिर गई कहां
06:41तकसीम हिंद के बाद ये जगा
06:43एवेक्यूवेट ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड के इंतिजाम में आ गई
06:46फिर 1978 से मुख्तलिफ एदारों को
06:49इसके हिस्से एलॉट होना शुरू हो गए
06:50पुलीस डिपार्टमेंट को तकरीबन 28,200 स्क्वेर यार्ड्स मिल गए
06:54फेडरल पबलिक सर्विस कमिशन को 6,000
06:57और अलीगर्ड मुसलिम युनिवर्सिटी को 3,500
06:59और जो असली अमारत यानी नापा का हिस्सा है
07:02वहां सिरिफ वही 4,500 स्क्वेर यार्ड्स बचे हैं
07:05ये अदाद शुमार खुद पूरी कहानी बयान कर देते हैं
07:08जैसे जैसे जमीन कम हुई कराची की हिंदू कम्यूनिटी
07:12अपने मजभी तहवार मनाने के लिए इसकी वापसी की मुसलसल कोशिश करती रही
07:161960 में पहली तहरीक चली जो जंगों की वज़े से रुख गई
07:20फिर 1980 में पाक हिंदू वेलफेर असोसियेशन ने इस इमारत को बिकने से बचाने की तहरीक चलाई
07:26लेकिन 2005 में उस वक्त के सदर परवेज मुशरफ ने ये इमारत नेपा के हवाले कर दी
07:32जिसके बाद एक तवील कानूनी लड़ाई चली यहां तक के 2018 में मुल्की सुप्रीम कोर्ट ने वाज़े हुकम दिया
07:39कि नेपा यहां से किसी और जगा मुंतकिल हो
07:41अब फैक्ट्स को देखें तो Heritage Foundation of Pakistan ने 1984 में इस शांदार इमारत को गिरने से बचा तो
07:48लिया
07:49मगर इस्तिमाल और मल्कीत का मसला अपनी जगा काइम है
07:512018 के सुप्रीम कोर्ट के इन एकामात के बावजूद 2020 तक के रिपोर्ट्स के मताबक नापा इस इमारत के अंदर
07:59से ही ऑपरेट कर रहा था
08:00तो यह मौमला आज भी एक मसलसल कानूनी और मौशरती कश्मकश का शिकार है
08:04तो राक से उटने वाले इस फन और इस मतनाजा घूसले की सारी कहानी सुनने के बाद एक बहुत ही
08:11एहम सवाल सामने आता है
08:12हम आखिर तवाजुन कैसे कायम करें
08:14एक तरफ कौम के परफॉर्मिंग आर्ट्स का इतना शानदार मस्तक्बिल है जिसे परवान चड़ाना है
08:20और दूसरी तरफ इस मुल्की अकलियती बरादरियों का वो कदीम और मजभी विर्सा है जिसे महفوظ रखना भी उतना ही
08:26जरूरी है
08:27दोनों अपने अपनी जगा एहम है आपके ख्याल में इस उल्जन का सही हल क्या हो सकता है
08:32ये वाकई सोचने की बाद है एक ऐसी सोच जो हम सब को इस सफर के आखिर में खुझ से
08:38जरूर पूछनी चाहिए
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