00:00जब भी जैपुर का नाम आता है, तो जहन में दिलकश महलात और वो खुबसुरत कुलाबी रंग उभरने लगता है.
00:08लेकिन क्या ये शहर महज एक जमालियाती शाकार है? बिलकुल नहीं. दरहकीकत, अगर गहराई में जाया जाये, तो पता चलता
00:17है कि ये पूरा शहर एक इंतहाई महतात, काइनाती, ग्रिड और कदीम, गैर मरी कुवतों के हिसाब से तामीर किया
00:25गया था.
00:26आज के इस जायजे में हम बिलकुल यही देखने वाले हैं कि किस तरह पत्थरों और साइनसी उसूलों ने मिलकर
00:33इस पूरे शहर को काइनात के साथ हम आहंग किया.
00:36तो जल्दी से देखते हैं कि आज हम किन किन मराहिल से गुजरेंगे. पहला वास्तु शास्त्र की साइनस, दूसरा पिंक
00:44सिटी का खाका, तीसरा जैपुर की मशूर इमारतें, चौथा आमेर किले के अंदर और पांचवा मुगल और राजपूत इत्तिहाद, यानि
00:54हम एक त
01:06एक गैरमरी खाका. अब वास्तु शास्त्र असल में है क्या? ये फन तामीर की एक बहुत ही जामे और कदीम
01:13साइनस है. ये महज कुछ दियो मालाई अकाइद का मजमुआ नहीं है, बलके हकीकत में ये रोहानी नजरियात को इंतहाई
01:21साइनसी जियोमेटरी और जगों की दु
01:35और इस पूरी साइनस की बुन्याद जिन चीजों पर खड़ी है वो ये पांच अनासिर हैं जिने पंच भूत कहा
01:42जाता है. जमीन, पानी, आग, हवा और खला. इनमें से हर एक उनसर की अपनी एक अलग खासियत है. मिसाल
01:50के तोर पर जमीन इस तहकाम लाती है जबके पानी,
01:53रवानी और पाकिजगी की अलामत है. वास्तु शास्तर का कमाल ये है कि ये इन तमाम काइनाती कुवतों को मखसूस
02:01जिग्राफियाई सम्तों के साथ बिलकुल दुरुस्त अंदाज में जोड़ देती है. अब इस हवाले से जो बात सबसे ज़्यादा दिल्चस्प
02:08है वो य
02:21जुनूब की सिम्त को भारी सामान या सनती चीजों के लिए मुक्दस किया जाता है. ये सब इसलिए किया जाता
02:28है ताके तवनाई का बहाव बिलकुल हमबार रहे. चलते हैं दूसरे हिस्से की तरफ. पिंक सिटी का खाका और काइनात
02:36के साथ उसकी हमाहंगी. ये वाकी हैरा
02:40जाती यसूलों को एक इतने बड़े शेहरी पैमाने पर कैसे लागू किया गया. ये खाका शांदार तरीके से वाज़े करता
02:47है कि अगर 16 सिम्तों वाले वास्तू चकर को जैपूर के सिटी पैलिस और इसकी बिलकुल सीधी सड़कों पर रखा
02:54जाए तो दोनों के दर्मियान
02:56एक ना काबिल यकीन मुमासलत नजर आती है. शेहर का कोना कोना एक खास सिम्त और अंसर के हिसाब से
03:02डिजाइन किया गया था. वैसे जैपूर को पिंक सिटी क्यों कहा जाता है? अगर्चे इसकी बुनियादें तो बहुत कदीम हैं,
03:10लेकिन ये जाहरी पहचान इसे 19-वी स�
03:27और ये ही गुलावी रेतीला पत्थर आज इस शेहर की जदीद शनाख्त है. उस वत के मनसूबा साजों की महारत
03:34देखिए, मंदरों को पानी के उनसर के हिसाब से शुमाल मश्रिक में रखा गया. इंतिजामी और भारी इमारते जमीन के
03:41उनसर के तैद जनू मघरब में गई
03:43और शेहर का जो बिलकुल दर्म्यानी हिस्सा था, जिसे ब्रहमस्थान कहा जाता था, उसे तवानाई के आजादाना बहाओ के लिए
03:50बिलकुल खुला और रुकावटों से पाक छोड़ दिया गया. अब आते हैं तेसरे हिस्से पर, जैपर की मशूर इमारतें जहां
03:57पत्थर
04:13इन इमारतों की महराबें, खुबसूरत च्छत्रियां और बड़े-बड़े सहन अपनी शाही अजमत की गवाही खुद देते हैं।
04:44एक और एहम बात ये है कि ये रिवायती डिजाइन कभी भी बस अंधी तकलीद नहीं था. ये साइंसी जरूरतों
04:50और राजस्थान की शदीद गर्मी के हिसाब से खुद को ढाल लेता था. मिसाल के तौर पर जंतर मंतर की
04:57दुन्या की सबसे बड़ी पत्थर की धूब घड�
05:00जियाती दुरूस्तिगी की जीती जाकती मिसाल है. इसी तरह मानसागर जील में तैरता हुआ जल महल जिसके निचली मनजिले पानी
05:08के अंदर हैं, ये दिखाता है कि इमारत को गुदरती तोर पर ठंडा रखने का कैसा शानदार तरीका अपनाया गया
05:14था.
05:14चौथा हिस्सा अमीर किले के अंदरूनी मनाजिर
05:18शहर से तकरीबन बारा किलो मीटर दूर पहाड़ियों में वाके ये किला इस खिते का आबाई और इंतहाई महफूज मुकाम
05:26है. आज नजर आने वाले इस शानदार महल की तारीख काफी पुरानी है. अब्तिदा में इसे मीना बरादरी ने आबाद
05:33किया और बाद में ये क�
05:48हद दर्जा पुरताईश है. बिलखुस शीश महल जहां राजा किया करते थे. उसकी दीवारों और च्छतों पर हजारों छोटे छोटे
05:58आईने इस महारत से लगाए गए हैं कि अगर रोशनी की एक छोटी सी किरन भी अंदर आए तो वो
06:03पूरे कमरे को जगमगा देती है. ब
06:18बलकि सियासत से भी बहुत मतासिर होता है. सुर्ख रेतले पत्थर और सफेद संगमरमर का ये खुबसूरत मिलाप असल में
06:25मुगल और राजपूत सल्तनतों के सियासी इतिहाद का ही अक्स है. राजपूतों के जरोके और छट्रिया मुगलों के वसी सहन
06:31और चारबाग स्ट
06:48स्ट्रिटीजिक रिष्टों की एक नई पॉलिसी अपनाई. आमेर के राजा बहारी मल के साथ इतिहाद और फिर जोधा बाइस से
06:55शादी ने बरिसगीर की तारीख में एक बिलकुल नए और रवादार दोर की बुनियाद रखी. तो यहां समझने की सबसे
07:03एहम बात ये है कि
07:05ये महस कोई काख़ों पर लिखा हुआ अमन मौाहिदा नहीं था, बलके क्यादत की सथा पर एक गहरा इंजमाम था.
07:13राजपूत मुगल सल्तनत के किलीबी सुतून बन गए. राजा मान सिंग और भगवंत दास जैसी नमाया शखसियात को आला तरीन
07:22फोजी और सिविल ओहद
07:35है कि एक राजपूत बादशा यानि राजा मान सिंग ने ही मुगल फौज की कयादत करते हुए महाराना प्रताब का
07:41मुकाबला किया. ये एक बहुत बड़ी और खूनी जंग थी और ये इस बात को साबित करती है कि उस
07:47वक्त की सियासी वफादारियां किस हद तक मजबूत �
07:50और पिचीदा हो चुकी थी. आज के इस मुकमल जाइजे को समेटते हुए इस एक ख्याल पर गोर करना बहुत
07:57जरूरी है. जैपूर का शहर इस बात की शानदार मिसाल है कि कैसे किसी खिते ने अपनी हंगामा खेस सियासी
08:04तारीख और काइनाती हमहंगी के दरमियान एक जब
08:20एक ऐसा सवाल जो वाकई गहराई से सोचने पर मजबूर कर देता है. जब आज के इन कंक्रीट के जंगलों
08:26और जदीद शहरों को देखा जाए तो क्या ये महसूस नहीं होता कि हमने जदीदियत की दौड में उस तवाजन,
08:33उस रुहानी हमाहंगी और उन कदीम साइंसी अस
08:50अगली बार तक के लिए खुदा हाफिज
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