00:28नमस्कार
00:30इच्छाएं मन में पैदा होती हैं, मन हर इच्छा के साथ नया पैदा होता है, इच्छा पोन होते ही मन
00:36मर भी जाता है, नवो नवो भवती जाय मानू, इच्छा कैसे पैदा होती है, कोई नहीं जानता, इच्छा पैदा भी
00:45नहीं की जा सकती, उठी हुई इच्छा को पूरा
01:08।
01:10जिनको भोगने के लिए जन्म होता है
01:13मन बड़ा विजित्र है
01:15यहा करता कुछ है
01:16रमता कही और है
01:18मन को जानना, समझना
01:20और नियन्तर्ण में रखना बड़ा कठिन है
01:23गीता में भी कहा गया है कि
01:25चंचलं ही मनहकृष्णा
01:27यहा मन बड़ा चंचल है
01:30किसी एक विशय पर टिकता ही नहीं
01:33सामान्य तह यह माना जाता है कि सन्यास लेकर ही
01:36मन व इंद्रियों का सैयम संभव है
01:39किन्तु ऐसा नहीं है
01:41व्यक्ति हर आश्रम में ही मन को वश में रख कर जी सकता है
01:45इस बात को अनुगीता के दृष्टांत से समझा जा सकता है
01:59जिया जा सकता है
02:00शुकदेव को राजा जनक के यहां भीजा
02:03जो की अपने काल के महान मनीशी थे
02:06वहाँ पहुचे तो देखा
02:08राजा जनक सुन्दरियों के बीच आमोद प्रमोद कर रहे है
02:12शुकदेव ने सूचा कि यह कैसे मनीशी है
02:14मैं तो कुछ और ही कलपना करके आया था
02:17उन्होंने जनक से पूछी लिया
02:20आपके जीवन में क्या यह सब बेमेल नहीं है
02:23जनक ने कहा पहले भुजन करो विश्राम करो
02:27विश्राम के बाद जनक ने पूछा भुजन कैसा लगा
02:30शुक देव बोले भुजन तो ठीक था
02:33किन्तु सिर्पर तलवार लटक रही थी
02:35धागे में बधी हुई
02:37अधिक्ता ध्यान उधर होने से स्वाद नहीं आया
02:40यही हाल विश्राम का भी रहा
02:43राजा जनक मुस्कुरा दिये
02:45तुम्हारी बात का यही उत्तर है
02:47मैं भी अपने सिर्पर यम्राज की तलवार को
02:50सदा देखता रहता हूँ
02:51अतह मुझे किसी अन्य वस्तु में
02:54रुची या स्वाद का अनुभव नहीं होता
02:56मन की स्थिरता वा पसन्यता ही
02:59उसके स्वस्त होने के लक्षन है
03:01इसी से शरी का स्वाद्थे भी
03:03ठीक रखा जा सकता है
03:05और बुद्धी का भी
03:07उस पर बुद्धी का नियंतर न रहे
03:10तो मनों विकारों का जन्म लेने में समय नहीं लगता
03:13बुद्धी को तो हित अहित
03:15और अच्छे बुरे का विचार करना ही है
03:18पर मन के आवेश
03:19आवेग और एहंकार जैसे
03:21दोश बुद्धी को असंतुलित कर देते हैं
03:24स्वार्थ भी मन में
03:26संकुचन पैदा करता है
03:27इश्वर का सहारा इसी लिए
03:29उत्तम होता है कि कहीं तो
03:31व्यक्ति स्वार्थ शोड़ सके
03:33समर्पन कर सके प्रसन और
03:35शांत चित्त हो सके
03:37निरोग रहने की यह
03:39एक अच्छी आधार हुई है
03:40आहार विहार और साधन शुद्धी
03:43इसमें ही समाहित होते हैं
03:46मन और बुद्धी की सीमा होती है
03:48जबकि आत्मा को
03:49असीम कहा गया है
03:51आत्मा पर त्रिगुन का आवरण ही
03:53उसको सीमा बद्ध करता है
03:55शुद्ध आत्मा का गुण है देखना, जानना और आनन्द भाव में इस्थित होना अर्थात
04:01मन पहले इस्थिर हो जाए, इंद्रियां इस्थिर हो जाए, शरीर इस्थिर हो जाए
04:06अस्थिर शरीर में मन भी चंचल रहेगा
04:09महत्वपूर्ण बात यह है कि उस अवस्था में प्रयास नहीं करना चाहिए
04:15प्रयास तो चंचलता का हेतु है, चंचलता रोग का हेतु है
04:19मानसिक विकारों की शुरुआत मन की चंचलता से ही होती है
04:24मन को स्वीकारना, उसे जानना, उसकी विभिन अवस्थाओं एवं कारणों का चिंतन करना मानसिक स्वास्थे की प्रथम आवश्यक्ता है
04:34मन की अनेक अवस्थाएं होती हैं, जो बदलती रहती है
04:38मूल रूप से उसकी चार भील, अजवा चार श्रेणिया हैं, मूल, विक्षिप्त, श्रिष्ठ और निरुथ
04:44इच्छा मन को प्रेरित करती हैं, प्रवरित करती हैं
04:48इच्छा के साथ आसकती जुड़ी है, आसकती के साथ साथ राग द्वेश का भाव जागरित होता है
04:54प्रवर्ति के बाद इस्मिती और अगली प्रवर्ति से पूर्व, कल्पना मन को आवरित करती हैं
05:01इसी से मन का भटकाव भी पैदा होता है, और एकागरिता भी रुद्ध होती है
05:07इंद्रियों का योग नितने आकरशन मन के सामने प्रस्तुत करता रहता है
05:12अनेक विकल्पों के चित्र बनाता है, मन पर स्वस्थ बुद्धी का नियंत्रण ही हमारी मनोयात्रा का मार्ग प्रशस्त बनाता है
05:21नमस्कार
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