00:28नमस्कार
00:30माया की इस आक्रामक्ता ने युद्ध भूमी का रूप दे दिया है। कहीं कहीं तो एक अनार सौ बिमार का
00:36दुश्य भी दिखाई दे रहा है। सत्ता, पद, सम्रिध्धी सभी तो लक्ष्मी का फैलाव शेत्र है। लक्ष्मी स्वय माया है।
00:44जण होने से पशु भाव भी प
01:04पुरुष्ण भाव निर्भर करता है। आज चुखी विवहा देर से होने लगे हैं, कामभवेक बहुत पहले कारे करने लगता है।
01:13जिसे गुद्धी निरंतर धक्का मारकर किनारे करती रहती है। यहां व्यक्ति की समझ शरीर तक ही सीमित दिखाई पड़ती है।
01:21लगता �
01:22अलपकाल का मनोरंजन है और आवश्यक भी लगता है। बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ जाते हैं युगल। इस्त्री की
01:29कामना भारी पड़ती है। वही आज पुरुष को प्रेजित करती है। प्रेजित तो पहले भी वही करती थी, प्रेम से
01:36निमंतरन देती थी, आज
01:38आकरामक होती जा रही है। किसी अन्य इस्त्री के हाथ से छीनने में भी कोई हिचक नहीं होती। मानो उसी
01:45के लिए पैदा हुई है। फिर शिकार भी घर बैठे ही मिल रहा है। इस प्रकार एक लंबे जाल में
01:51फस्ती चली जाती है। जीवन की एक साधारन घटना की तरहा�
01:56सत्यूग से कल्यूग तक की सारी कहानी माया ही रच्चती आई है। फुरुष आगे से आगे कमजोर होता गया माया
02:04के रूप विकासने बदले। शरीर वही रहा उसे देखने की दिश्टी बदलती गई। सत्यूग में देवता उसे अपनी रक्षा के
02:11लिए प्रार्चना कर
02:12करके बुलाया करते थे, वह असुरों का वद करके देवों की रक्षा किया करती थी। देश्वर में माया की दिव्यता
02:19की आराधना के लिए मंदिर बने अनुष्ठान होते रहे। इसली रूप में माया ने ही पुरुष को कमजोर किया, शक्तिमान
02:28को पकड़ती रही, कमजो
02:58ुप्रुप्त
03:12लक्ष्मी बनकर विश्व पर एकाधिकार कर लिया
03:15मानव अपना स्वरूप विस्मृत कर बैठा
03:18जो देवता के इसकर तक उठ सकता था
03:21मोक्ष मारगी होने के लिए पैदा किया गया था
03:23उसने माया को ही मोक्ष का द्वार मान लिया
03:26इसके आगे अन्य उपलब्धियां गौन हो गई
03:30कहने को माया सुख्ष्ण से भी सुख्ष्ण है
03:33किन्तु उसने क्षर शरीर में प्रवीश करके कारे शुरू कर दिया
03:37मूल रूप में सरुप्रथम माया ने ही विश्व रचना का भूमी पुजन किया
03:42भवन तयार हो गया
03:44इसकी चकाचौन इतनी व्यापक है कि प्रत्यक योनी में ब्रव्भ अपने स्वरूप पर मुग्ध है
03:50युगारंभ में मानव भी निर्वस्थर रहता था
03:53आज पुनह उसी अवस्था में लौट रहा है
03:56वस्त्र विक्सित मानचित्ता को काटने लगे है
04:00विक्सित देशों में न्यूट क्लब इसका बड़ा प्रमाण है
04:03धर्म से दूर होते ही अर्थ और काम पर आधारित रह गया हमारा पुर्शार्थ
04:08दोनों ही लक्षमी की जड़ संस्था पर आकर ठहर गए
04:12आहार निद्रा भर मैथुन ही पश्यू पुरुशार्थ रह गया
04:16विभापूर्वतो ग्रहस्त आश्रम शुरू हो गया
04:19यही बस मृत्यू परियंति जारी रहता है
04:21शेश दोनों आश्रम धर्म के साथ ही विदा हो गये
04:25लक्षमी ही सकता है धन है भोग है
04:28युद्ध के पीछे ही सकता है
04:30हर युग में एक महा युद्ध ने
04:32इस्त्री को सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया
04:35नर्समुदाय युद्ध में शहीद हो गया
04:37हर बार नाजी बिचारी हो जाती है
04:40आजबह बिचारी भी है
04:41विद्भा के रूप में और आक्रामक भी है
04:44विकास की कैद में
04:45पुरुष अपनी जिन्दगी जी रहा है
04:47बिना इस सिंतन के
04:49इस्त्री की भूमिका पर क्या प्रभाव पड़ेगा
04:52दिरे दिरे इस्त्री भी
04:53अकेले जीने का अभ्यास करने लगी
04:55विभा और संतान उसकी आवश्यक्ता नहीं रहे
04:58वह भी युद्ध में जाती है
05:01कोई पुरुष उसके लिए विद्भाया विधुर नहीं होता
05:04सभ्य समाज के बलातकारों से
05:06पीछा छूटा माया का अगला कदम क्या होगा
05:10क्या वह काली बनकर
05:11अपने ही निर्मान को ज़स्त करने निकल पड़ेगी
05:14नमस्कार
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