00:28नमस्कार
00:30इसमें तीन प्राणों की भूमी का मुख्य होती है रिशी, पितर एवंदेव। पत्यक व्यक्ति इन तीन रिनों को साथ लेकर
00:37जन्मिता है। इसमें पित्रे रिन संतान के साथ जुड़ा है। अतह व्यक्ति विभा बंधन में बनकर संतती परंपरा को आगे
00:46बढ़ाता है। �
00:57हम देव विशेष से संतान की प्राधना करते हैं। मनौतियां मानते हैं, संतान को परिवार के अनुरूप तैयार भी करते
01:06हैं। यतोजित संसकार देने का भी प्रयास सभी का रहता है। हमारा संपूर्ण जीवन सिर्फ प्रारद की कहानी है। पूर्वजन्वृत
01:15कर्मों क
01:19ुश्वजन, परिजन, बंदु, जाति, संतान, मित्र, शत्रु सभी के साथ हमारा रिणानु बंदु जुड़ा है
01:27इनी रिणों का विपाफ करने के लिए हम सब का साथ सुनिशित हुआ है
01:32ब्रह्म की इस त्रिष्टी में हम सब खिलोने हैं
01:36फिर दुख में दुखी हो या सुख में सुखी, क्या फर्क पड़ता है ब्रग्व को
01:40उसको तो अपने कामना संसार को बनाये रखना है
01:44इस हेतु वह माया को न्यूक्त करता है
01:47माया जीव को यथा संभव इस संसार चक्र में उलजाये रखती है
01:52स्रिष्टि का एक ही सुत्र है सहित भाव
01:55सभी एक दूसरे से जुड़े हैं
01:58इसी के साथ प्रत्यक जीव स्वतंत्र भी होता है
02:01पूर्व करमानुसार अपना जीवन क्रम साथ लेखराता है
02:05जीव माता पिता को स्वयम चुनता है
02:08संतान की अभिलाशा से
02:09जब दमपती एक मना होकर प्रार्थना करते हैं
02:13तो वे कामनाय प्रम्हान लस्थ उस जीव को आक्रिष्ट करती है
02:18जीव की भी भावी जीवन यात्रा
02:21यदि यहां से पूर्णता हेत्तु जुड़ती है
02:24तो वह गर्भस्थ होकर उन दमपती के जीवन में प्रवेश करता है
02:29गर्भ जीव का एक अस्थाई निवास है
02:32दस माह उसे मात्री कुक्षि में आश्रे मिलता है
02:36यह अत्यल्ब अवधी उसके संपूर्ण जीवन का आधार होती है
02:40उसको यही समझ आता है कि वास्तव में मैं कौन हूँ
02:45कई बार जीव उस पीड़ा में अपने 84 लाख योनियों के भोग का भी साक्षात करता है
02:51वह मास संसकारित भी होता है
02:54संसकारवती माता उसे आत्मभाव से सिंचित करती है
02:58यदि मदालसा जैसी हो तो
03:01अन्यथा सत्यवती के समान भोग की शिक्षा भी देती है
03:05बालक के भविश्य का लेखा जोखा गर्भावस्था में ही लिख रिया जाता है
03:10वस्तुतहर जीवन में दो ही अवस्थाएं अनुभूतियां प्रमुख हैं सुख और भोग
03:16सुख एक मानसिक इस्थिती है जो भोग के अभाव में भी संभव है
03:22भोग तो दुख का प्रवेश्टवार है
03:25यदि हम जीवन को भोग का साधन या भोग के लिए मानते हैं तो सुख का अभाव होना तय है
03:33सुख मूलत वह अवस्था है जिसमें चित्त शांत रहता है उद्वेग या विचलन भाव नहीं रहता
03:40यदि गर्भा वस्था में माता भोग विलास में लिपत रहती है तो उसे अध्यात्म से जुड़ने का समय ही कहा
03:48जीव अपने सुख मिशरीर से माता की इनहीं विलासिता पूर्ण मनोगृत्तियों से जुड़ता है
03:55भोग हेतु ही अपने जीवन को समझता है ऐसी भावना से जन्मने वाला बालक सत जुड़त्ती में कैसे जुड़ पाएगा
04:03कौन माता पिता हैं जो ये चाहते हैं कि उनकी संतान कू संसकारी हो घोर व्यसनों में डूबी रहे
04:11संतान सपना होती है जीवन की आस होती है आपका समझत संसार होती है
04:17अच्छी संसकारवान संतान के लिए माता-पिता प्रार्थना करते हैं
04:22उसके उत्तम स्वास्थे की चाहना प्रदिक्षन उसन के रिदय में रहती है
04:27किन्तु क्या हर बच्चा संसकार संपन होता है?
04:31अगर नहीं तो ऐसा क्या कारण है कि ब्रम्भाश भूत हर जीव भिन्न भिन्न प्रक्रतिका होता है
04:39क्रिश्न की यह उक्ति तब महत्वकून हो जाती है
04:42जबकि मात्री कुक्षी से संसकार हीन बालक जन्म लेता है
04:46जन्मना जायते शूत्रह संसकाराथ द्विज उच्यते
04:51जर्व से भूमिष्ट होते ही बालक के जीवन के परिशकरण के साधन भूत तत्र संसकार बनते है
04:59जात कर्म, नामकरण, अनप्राशन, क्यूराकरण, वेदारंभ, उपनयन, आदि, लौकिक संसकार, दोशों का सम्मार्जन कर, बालक के शुद्धी करण का मार्ग
05:11प्रशस्त करते है
05:12ये संसकार यद्यपी, बाहिय, भौतिक संसार के हैं तथा पी कहीं न कहीं इन से अन्ता करण की शुद्धी भी
05:22होती है
05:22माता जो संसकार गर्भ में नहीं दे पाई, उनकी पूर्टी का मार्ध्यम ये कर्म बनते हैं
05:28इस समय परिवार जनों के साथ साथ सर्वाथिक महत भूनी का गुरू की होती है
05:34इसी कारण गुरू को गोविंद से भी उपर स्थापित किया गया है
05:39गुरू गोविंद दो खड़े काके लागू पाए, बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताए
05:46संसकार जीवन की दिशा तै करने में महत्वपून है
05:49संसकार से ही स्वभाव का निर्मान होता है
05:53इसी पर भावी आचरन निर्भर करता है
05:56वर्तमान बहुतिक वादी परिवेश में संसकार शब्द भी मात्र उपकरन रह गया
06:02भोग संसक्रती में उल्चे समाज वा परिवार में मर्यादाओं का बंधन तूट गया
06:07ऐसी विकट परिस्थितियों में संतान को जीवन मूल्यों वा संसकारों का पाठ पढ़ाना असंभव लगने लगा है
06:16उनको माता-पिता और गुरु जनों की सीख अब बेमानी लगने लगी है
06:21मोबाइल और टैब उनको जीवन के मंत्र सिखा रहे है
06:25आज मानव ग्यान पर यह मशीनी ग्यान भारी हो गया
06:29नई भी ही विवेकशील नहीं है
06:31उनका जीवन यंत्रवत है
06:33आज परिवार नाम की पाटशाला का अस्तित्व ही खत्रे में है
06:37पहले सायुक्त परिवार में बालकों को आरंभ से ही रिष्टों की समझ होती
06:43मर्यातित जीवन को वे स्वयम देखते थे
06:46उच्रिंखलता और स्वच्छंदता कहीं भी किसी भी परिवार जनके आश्रण में नहीं थी
06:52तब एक संसकारवान पीड़ी पोशित होती थी
06:55परिवार रूपी वट व्रिक्ष के आश्रय में
06:59नमस्कार
Comments