00:28पौरानी कथा के नुसार
00:33कद्रु ने शर्त जीतने के लिए अपने नाग पुत्रों से कहा कि वो सूक्ष्म रूप धारन करके उच्चे श्रवा की
00:39पूच से लिपड़ जाएं ताकि उसके बाल काले दिखाई दे कद्रु के नाग पुत्रों ने अपनी माता की बात मानने
00:45से इनकार कर दिया उन्होंने क
00:47कि छल और अधर्म का सहारा लेकर शर्त जीतना उचित नहीं है नाग पुत्रों के इस निर्णय से कद्रु बेहद
00:54क्रोधित हो गए नाग पुत्रों के इनकार से क्रोधित होकर कद्रु ने उन्हें श्राप दिया कहा कि जब पांडव वंश
01:00के राजा जनमेजय अपने पिता
01:02परिक्षत की मृत्यू का बदला लेने के लिए सर्प यग्य करेंगे तब सभी नाग उस यग्य की अग्नी में भस्म
01:08हो जाएंगे
01:09माता के श्राप से भैभीत होकर नागराज वासुकी अन्य नागों के साथ ब्रह्मा जी की शरण में पहुँचे उन्होंने ब्रह्मा
01:16जी से श्राप से बचने का उपाय पूछा तब ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि तपस्वी रिशी जरतकारू से वासुकी
01:23अपनी बहन
01:28की बहन से हुआ, दोनों के पुत्र के रूप में रिशी आस्तीक का जन्म हुआ, आस्तीक आगे चलकर अत्यन्त विद्वान
01:34और तेजस्वी रिशी बने, उनके जन्म का उद्देश ही नागों को कद्रू के श्राप से बचाना था, समय बीटता गया,
01:41राजा जन्मेजय के पित
01:55केक करके नाग खीचते चले गए और अगनी में भस्म होने लगे, इससे नागों में है फैल गया, जब नागों
02:01का विनाश होने लगा, तब रिशी आस्तीक राजा जन्मेजय के यग स्थल पर पहुँचे, उन्होंने अपनी विद्वता और मधुरवानी से
02:09राजा को प्रस
02:23धार्मेक माननेता है कि जजदन आस्तीक मुनी ने नागों को सर्प यगी की अगनी से बचाया, वो सावन शुकल पंचमी
02:30का दिन था, इसी वज़ा से नाग पंचमी के दिन नाग देट्ता की पूजा करने की परंपरा मानी जाती है
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