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  • 11 hours ago
सहधर्मिता ही दाम्पत्य

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00:28नमस्कार
00:30पहले उमा रहती है, दोनों में से कोई भी अकेला स्रिष्टी नहीं कर सकता, यथा अंडे तथा पिंडे के अनुसार
00:37हमारा जीवन और ब्रम्हांड एक ही सिधान पर कार्य करते हैं, इस थूल रूप में पुरुष और नारी ही प्रक्रती
00:45रूप है, पुरुष और नारी दोन
00:47एक हैं, ब्रम्ह स्रिष्टी में अकेला है, वही स्वयम की माया बनकर स्रिष्टी की रचना करता है, अतह संपून स्रिष्टी
00:56भीतर एक रूप ही है, सभी एक ही ईश्वर के अंश है, सब के रिदय में भी एक ही तत्व
01:03रहता है, व्यभार में भी पुरुष के भीतर इस्त्
01:45ुद्धान्त
01:49या तो बुद्धी मानी से या फिर मन मानी से
01:53बुद्धी सूर्य से प्राप्त है, गर्मी भरी है
01:56मन का स्वामी चंद्रमा है, शीतल है
01:59अगनी विकास सुचक है, सोम का स्वभाव संकोच है
02:03अगनी रुद्र तथा सोम शद्धा तत्व है
02:072. दोनों के योग से दोनों का संदक्षन है
02:103. विभाजन से दोनों अतिक्रमी बन जाते है
02:134. अगनी सोम के अभाव में मंद पर जाता है
02:164. सोम अगनी में आहुत होकर यज्य का स्वरूप निलमित करता है
02:205. स्वयम अपनास्चित्व छोड़ देता है
02:23अग्मी में अग्मी की आहुती से उसका रौद्र रूप प्रकट होता है
02:28प्रेम शब्द कई भावों का संगम है
02:30इसका अभ्यास अत्यंत कठिन भी है
02:33बड़ों के प्रती प्रेम को शद्धा कहते हैं
02:36यह भी एक कठिन मार्ग है जैसे जल को उपर जढना
02:40छोटों के प्रती प्रेम को वात्सले कहा जाता है
02:43जहां दोनों का बराबर का संबंध है
02:46मित्रवत है उनके प्रेम का नाम स्नेह है
02:49जड़ पदार्थों के प्रती प्रेम को कामना या काम कहा जाता है
02:53इन चारों भावों का संगम जहां सारे भाव मिलते हैं
02:57उस प्रेम को रती कहते हैं, इसके दो ही उधारण हैं गेवता के साथ तथा जीवन साथी के साथ दामपत्य
03:05रती, इसी कारण दामपत्य भाव को दो आत्माओं का मिलन कहा गया है।
03:10दामपत्य में दोनों की रती एक दूसरे के प्रती समर्पित रहती हैं, दोनों 25 वर्ष पर्यंत सहधर्म रूप ग्रहस आश्रम
03:19चलाते हैं, 50 वर्ष की आयू आत्याते पती बतने वानप्रस्थ की तयारी में लग जाते हैं।
03:27बानप्रस्थ भी मूल में तो सन्यास आश्रम की तयारी ही है, अतह यह दामपत्य रती ही आत्म रती में रूपांतरित
03:34होती हैं।
03:55शरीर के लिए जीने लगा है। दामपत्य भाव भी शरीर के आगे नहीं जाता है। जीवन भर दोनों ग्रहस ताश्रम
04:03में ही जीते हैं।
04:05जीवन का लक्षिय मात्र भोग शाजरिक सुख रह जाता है। आज की नारी पती से भिन पहचान और स्वतंत्रिता के
04:12लिए संगर्श कर रही है।
04:14इसमें अनेक प्रशन अपना उत्तर मांगते हैं। घर से बाहर स्वयम अपनी सुरक्षा में समर्थ नहीं है।
04:21स्रिष्टी में देवता एक चौथाई तथा असुर तीन चौथाई होते हैं।
04:26। । । । । । ।
04:56न समाज की प्रधानता रहती हैं न परिवार की।
04:59आप पुनह आदी मानव की तरह कंकरीट के जंगल में भटकते रहो।
05:03आप किसी को अपने साथ बांधना चाहते हो तो आपको बंधने की तैयारी भी दिखानी पड़ेगी।
05:09अपने टाक्रतिक फ़रूप को छोड़ना ही आत्मा को विश्मित कर देना है।
05:14उसका व्यक्तित्व इस्त्री हो या पुरुष उस दिन भस्त हो जाता है।
05:19हमें उनके जीवन का निची जीवन का भी अध्यायन करना चाहिए।
05:23क्या उनका जीवन सुख प्राक्ति के लिए नकल करने जैसा है अत्वा क्या हम उनकी तरह जीवन जीने को तैयार
05:30है।
05:31आज क्या हो रहा है हमें यह भी चाहिए वो भी चाहिए।
05:35दो घोडों की सवारी उम्र भर संभव नहीं है।
05:38भारत में कहते हैं व्यत्रे नार्यस्तो पुज्यंते रमंते तत्र देवता।
05:43आज भी यह सही दिखता है। पश्चिम की नकल और शिक्षा ने नारी को भोग की वस्तु बना दिया।
05:49वह भी उसी रूप में आ गई। व्यक्ति परिवेश से बनता भी रड़ता है।
05:54वरना इस्त्री द्वारा तैयार किया गया लड़का संसकारित होकर किसी इस्त्री से अभद्र वहवार कर सकता है।
06:02इस्त्री की यही वह भूमिका है जो देश का निर्मान करती है। यह शक्ति प्रक्रति ने पुरुष को नहीं दी।
06:09पुरुष भी इस्त्री के गर्भ में नौ माहबाद शिक्षा ग्रहन करता है।
06:15इस्त्री की इस भूमी का के अभाव में ही प्रित्वी पर तांडव दिखाई दे रहा है इस्त्री पुरुष का भविश्य
06:21कोई बाहर से आकर नहीं सवारेगा नमस्कार
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