00:28नमस्कार!
00:30उनके हाथ और पैर अधूरे क्यों है? उनकी आखें इतनी बड़ी और बिना पलग जपकाए लगातार देखने वाली क्यों है?
00:38ये एक ऐसा रहस्य है जिसने सदियों से बड़े बड़े विद्वानों को भी हैरान कर रखा है? जरा इस तुलना
00:45को देखिए! आम तोर पर जब ह
00:46किसी भगवान की मूर्ती की कलपना करते हैं, तो वो एकदम सम्मित यानि सिमिट्रिकल होती है, शारीरिक रूप से एकदम
00:52पूर्ण, लेकिन पुरीमी विराजमान भगवान जगनात का रूप बिलकोल अलग है, उनके हाथ पैर सपष्ट नहीं है, और वो बड़ी
01:00-बड़ी
01:16युद्ध के अंत में जब माता गांधारी ने अपने सौ पुत्रों को खो दिया, तो उन्होंने उस भयंकर दुख में
01:23भगवान श्री कृष्ण को एक शाप दे दिया, उन्होंने कहा कि जिस तरह उनका वंश खत्म हुआ है, ठीक 36
01:31सालों के भीतर कृष्ण का यदुवंश �
01:33अब ही आपस में लड़कर मिट जाएगा, और स्वर्ण नगरी द्वारका समुंदर में डूब जाएगी, और श्री कृष्ण वो बस
01:41मुस्कुरा दिये, क्योंकि वो जानते थे कि ये सब उनकी ही रची हुई लीला का हिस्सा है, अब इस टाइम
01:48लाइन पर नज़र डालिए
01:49ठीक, 36 साल बाद वो खौफनाक श्राप सच साबित हुआ, यादुवंशियों में भयंकर कलह हुई और द्वारका डूबने लगी, इसी
01:58विनाश के बीच एक जंगल में श्री कृष्ण एक पेड़ के नीचे विश्राम कर रहे थे, उनके लाल चरन किसी
02:05कमल की तरह चमक रहे
02:07तब ही जरा नाम के एक शिकारी ने दूर से उन चरनों को हिरन समझ कर तीर चला दिया, जब
02:12शिकारी रोने लगा, तो कृष्ण ने उसे समझाया कि ये कोई भूल नहीं थी, बरकि त्रेता युग में राम अफ्तार
02:19के दौरान बालीवद के कर्मों का हिसाब था, इसे ही कहत
02:34अगनी में उनका पूरा शरीर भस्म हो गया, लेकिन एक चीज थी जो जली ही नहीं, जी हां वो था
02:40श्री कृष्ण का दिव्य और चमकता हुआ हृदय, वो हृदय जिसमें पूरी स्रिष्टी का प्रेम समाया था, अगनी भी उसका
02:47कुछ नहीं बिगार पाई, तभी अचान
03:04दिव्य हृदय ने युगों और महासागरों को पार करते हुए एक बहुत लंबी यात्रा की, और ये बहता हुआ फृदय
03:12आखिरकार कहां पहुचा? उडिसा में, महानदी के तटपर. वहां सबर जनजाती के मुखिया विश्व वसु ने इस चमकते हुए काष्ठ
03:22खंड को
03:22देखा और तुरंद इसकी दिव्यता को पहचान लिया. उसने इसे एक गुप्त गुफा में स्थापित किया और नाम दिया नील
03:29माधव. विश्व वसु की भक्ती में कोई दिखावा नहीं था. बस एक भक्त का अपने भगवान से सीधा और सच्चा
03:37जुडाव था.
03:38खैर, ऐसी अलोकिक बात भला कितने दिन शुप सकती थी. अवंती के राजा इंद्रद्युम्न के कानों तक इस छिपे हुए
03:46देवता की खबर पहुँच कई. राजा विश्व के बहुत बड़े भक्त थे. उन्होंने तुरंत विद्यापती नाम के एक बहुत ही
03:53चतुर और
03:54साहसी ब्रामपड को नील माधव को खोजने के इस मिशन पर भेज दिया. सबर गाउं पहुचकर विद्यापती ने एक बहुत
04:01ही गजब का दिमाग लगाया. उसने मुख्या की बेटी ललिता से शादी कर ली. फिर काफी मिननतों के बाद ससर
04:08विश्व वसू उसे नील माध�
04:14पर पट्टी बंधी रहीगी. विद्यापती मान गया, लेकिन काफी चालाकी से उसने अपनी मुठी में सरसों के दाने भर लिये
04:21और पूरे रास्ते उन्हें एक-एक करके गिराता रहा. काफी स्माठ है ना? इसका नतीजा क्या हुआ? कुछ महीनों बाद
04:28जब बारिश हु�
04:28तो वो सरसों के दाने हरे भरे पौधों की एक कतार में बदल गए. राजा इंद्रद्युम्न ने इसी रास्ते को
04:35फॉलो किया और गुफा तक पहुँच गए. लेकिन वहां पहुँचकर उनका दिल तूट गया. गुफा पूरी तरह खाली थी. नील
04:42माधव वहां से गायव
04:44वो चुके थे. राजा पूरी तरह तूट चुके थे. लेकिन उनकी ये निराशा ज्यादा देर नहीं टिकी. उसी रात भगवान
04:51विश्नु उनकी सपने में आए. उन्होंने कहा कि वो नील माधव के रूप में अब नहीं रह सकते. लेकिन राजा
04:57को एक नया काम सौपा. भ
05:12उसी से जगनात, बलभद्र और सुभद्रा की तीन मूर्तियां बनानी है. अगले ही दिन चमतकार हुआ. वो विशाल और दिव्वे
05:21लकडी सच में किनारे पर तैरती हुई आई. लेकिन एक नई परेशानी खड़ी हो गई. राज्य की सेना और बड़े
05:29-बड़े हाथी मिलक
05:30उस लकडी को हिला तक नहीं पाए. तब राजा ने आदिवासी मुख्या विश्ववसु को बुलाया. और जैसे ही विश्ववसु ने
05:38उसे अपने सच्चे मन से चुआ, वो भारी भरकम लकडी एकदम हलकी हो गई. और तो और कोई भी मूर्तिकार
05:45उस बेहत कठोर लकडी प
05:59काम पूरा करने के लिए उससे बिलकुल अकेले एक बंद कमरे में ठीक 21 दिनों का समय चाहिए. अगर किसी
06:06ने भी बीच में दर्वाजा खोला, तो वो काम वहीं छोड़कर चला जाएगा. राजा ने शर्त मान ली, भारी दर्वाजा
06:13बंद कर दिया गया. अंदर से लगाता
06:15चीनी और हथोड़े की आवाजें आ रही थी, लेकिन पंद्रवें दिन. अचानक वो आवाजें बिलकुल बंद हो गई. एकदम सन्नाटा,
06:23सोचे उस वक्त महल में कैसा भारी सस्पेंस और बेचैनी रही होगी. रानी गुंडिचा बुरी तरह घबरा गई. उन्हें लगा
06:30क
06:30शायद वो बूढ़ा इंसान भूख प्यास से अंदर ही दम तोड़ चुका है. उनके बार बार जिद करने पर सोलवे
06:37दिन राजा ने दर्वाजा खुलवा दिया. शर्त तोट चुकी थी. अंदर वो मूर्तिकार नहीं था और तीनों मूर्तिया बिलकुल अधूरी
06:44थी. उन
07:00अच्छा थी. आकाशवानी ने कहा, मेरे ये बड़ी-बड़ी आँखें इसलिए हैं ताकि मैं बिना पलक जपकाए हर पल अपने
07:07भकतों को देख सकूँ. मेरे हाथ-पैर इसलिए अधूरे हैं क्योंकि मुझे किसी की मदद करने के लिए किसी शारेरिक
07:13साधन की जरूरत नह
07:28आनी श्री कृष्ण के उसी धड़कते हुए अमर हिदय को भगवान जगनात की लकडी की मूर्ती के अंदर स्थापित कर
07:34दिया. कहते हैं कि राजा उस लकडी के अंदर उस दिव्य धड़कन को साफ साफ सुन सकते थे.
07:40अब आप सोच रहे होंगे कि क्या ये सब बस इतिहास की बाते हैं? बिल्कुल नहीं. आज की इस मौडन
07:46दुनिया में भी ये रहिस्य एक आसाधारन परंपरा के रूप में जीवित है. हर 12-19 साल में नव कलेवर
07:53नाम का एक अनुष्ठान होता है. इसमें पुरानी मूर्तिय
08:08आज भी बिना किसी रुकावट के जारी है. और ये महा कावे जैसी यात्रा हर साल रत यात्रा के रूप
08:15में अपना सबसे भव्य रूप लेती है. इस दिन भगवान सिर्फ मंदिर की दिवारों में कैद नहीं रहते, बलकि विशाल
08:22रतों पर सवार होकर खुद सड़कों पर
08:38करते हैं. हम इनसान हमेशा परफेक्शन या पूर्णता के पीछे भागते हैं, जो अकसर बहुत दूर लगती है. तो क्या
08:45भगवान जगनात का ये अधूरा रूप वास्तव में ईश्वर और इनसान के बीच सबसे सच्चे और उत्तम जुडाव को नहीं
08:52दर्शाता? शाय�
09:10झाल
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