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क्या है भगवान श्री कृष्ण के धड़कते हृदय का रहस्य? देखें अद्भुत अविश्‍वसनीय अकल्‍पनीय

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00:10श्री जगन्नात नमो नमह श्री जगन्नात नमो नमह
00:28कितनी ही सभ्यताएं खत्म हो गए लेकिन एक रिदय जो कभी नष्ट नहीं हुआ
00:35श्री कृष्ण का वो रिदय जो कभी समाप्त नहीं हुआ
00:49उस रिदय के संरक्षक उसे देखने वाले क्यों कभी उसके बारे में किसी को बता नहीं सकते
01:09समूचे ब्रह्मांड का सबसे बड़ा रहस्य जिसे देखने वाले केवल चार लोग पृत्वी पर मौझूद है
01:16जो कहते हैं आज भी जीवित है भगवान कृष्ण पृत्वी पर केवल चार ऐसे व्यक्ति हैं जो उस प्रक्रिया का
01:27हिस्सा होते हैं
01:28यह कली जूक में जीवित भगवान है
01:30जे जगन्नात नमस्कार मैं हूँ श्वेता सिंग और आप देख रहे हैं अध्भूत और विश्वस्निया और कल्पनिया
01:52मतुरा व्रिन्दावन गोवर्धन पर्वत से लेकर द्वारका नगरी तक लेकिन द्वारका नगरी से आगे कहा जगन्नात पुरी
02:04जगन्नात पुरी में ब्रह्मांड का वो रहस्य है जिसके उत्तर आज तक कोई नहीं ढून पाया है वो ब्रह्म पदार
02:13श्री कृष्न का वो दिल श्री कृष्न का वो रिदय चो कभी समाप्त नहीं हुआ उनकी जीवन लीला के बाद
02:23भी इस संसार में उनकी लीला समाप्त नहीं हुई
02:26और आज अद्भूत अविश्वस्निय अकल्पनिय में हम आपको वही अविश्वस्निय और अकल्पनिय बातें बताएंगे जो कि आज भी अद्भूत बन
02:38के हम सब के बीच जीवत हैं
02:40चंदांशियस्य परनारियस्तं बेदस अबेद बीत अधाष्य अरद्भं प्रसुतास्त अस्य साखागुन अप्रवरधा विशय अप्रवारः
03:14यह दुनिया की सबसे बड़ी अधुद धार्मिक रथ यात्रा है बहुत अच्छा लग रहा है अध्वूत है यहां पर आके
03:26तो कुछ अलग सी वावना हो जाती है
03:30यह दुनिया की सबसे अधिक देखी जाने वाली रथ यात्रा है
03:38श्रद्धालू इस यात्रा का हिस्सा बनने दुनिया की तमाम देशों से आते हैं
03:47हम भगवान जगनाथ से यह मांगते हैं कि वो हमारी प्रात्ना पूरी करें और हमें सेवा करने का मौका दें
03:55मुझे पहली बार यह मौका मिला है जगनाथ जी के दर्शन करने का
04:03अद्भुत हैं भगवान के रत जो कई मंजिला उंचे होते हैं लेकिन कभी इनके निर्माण में लोहे की एक कील
04:10तक नहीं लगी
04:18सब कुछ हाथ से बनता है
04:29हमेशा से इस होता रहा है हम तो हम तो जब से जनम होएं तबसे देख हैं हमेरे बापाई जब
04:35से दनम वह हम यह सब हाथ से होता है
04:37कुछ में सेंग बुच्छ कुछ भी तेव बुच्छ साइव दिनी होगा सब हाथ पे लो
04:49अविश्वस निये है वो श्रधा जिसमें रध के यात्रा पत को पुरी के राजा सोने की जाडू से स्वयम साफ
04:56करने आते ही
05:03अकल्पनिय है वो विश्वास जो भक्तों को ये भरोसा दिलाता है कि भगवान खुद मंदिर छोड़कर उनसे मिलने चले आए
05:10हैं
05:15यह हमारा जो भगवान है ओ ओर जिनल पूरा मुला भगवान आते है रत का उपर में
05:23ओ भगवान भक्त के लिए जगत की दर्सन के लिए जगणात है उसकी नाम जो है जगणात और जगणात का
05:36नात है
05:40मान्यता है कि जिसने रत की रस्सी खीची उसका जीवन धन्य भुआ
05:50जा कर्का हो तो जाकर उसको रत को चूपाते है उसको ऐसे को खीच सैंग जो कीच्चें उसका मन में
06:01जो भाबना है जरूर पूरा होता है
06:14कि कहते हैं कि जिसकी द्रिष्टी भी रत पर पड़ गई उसका बेडा पार हुआ
06:22महाप्रवु के रत में दर्शन मात्र से ही भक्तों को मुक्ति मिल जाता है
06:25तो आज सभी भक्त आप देख सकते हैं पिसे तीन चार दिन से काफी बारिश हो रहा है
06:29उसके बावजूद भी इतना भीड है लोगों का दो उत्सा है वो कम नहीं हो रहा है
06:34जस्ट भगवान का एक दर्शन के लिए यहाँ पर सभी लोग एकत्रित हुए है
06:42और सबसे अध्भुत अविश्वस्निय अकल्पनिय भक्तिभाव यह है कि लोगों को यह महसूस होता है
06:48कि भगवान जागरित है जीवित है और उनका हृद्य युगों युगों से आज भी धड़क रहा है
07:01क्या ये केवल मान्यता है क्या ये केवल अहसास है या फिर इसमें कोई अंसुना अबूजा रहस्य है
07:15मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नात के अंदर जो हृदय धड़क रहा है वो भगवान कृष्ण का हृदय है
07:21पर ये कैसे संभव है क्या है भगवान जगन्नात का भगवान कृष्ण की लीलाओं से संबंध
07:28क्यों है भगवान के हृदय के आज भी प्रतिमा में होने की मान्यता
07:32आज अध्भुत अविश्वस्निय अकल्पनिय में सभी रहस्यों की कड़ी से कड़ी जोडेंगे
07:46पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण द्वापर में
07:50भगवान विश्णु के आठवें अवतार के रूप में अवतरित हुए और अपनी लिलाएं पूर करके वापस बैकूंठ लोट गए
07:57लेकिन क्या उनका हृदय प्रित्वी पर ही रह गया?
08:17तो क्या आज भी भगवान कृष्ण का हृदय निरंतर धड़कता रहता है?
08:22उनिस में जो नवकलवल हुआ था उसी में जो पदार्थ ब्रह्मा के साथ में मिलाकर तुल्सी, शुगंद फूल, चंदन, जैसे
08:35वो रखा था
08:36उनिस साल का बाद में दोजार पंदर में जब निकलेंगे तो उसी पकार जिवीद भी है
09:09पुराणों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार
09:11द्वापर युग में द्वारका से कुछ किलोमीटर दूर भालका में जरा नाम के भेलिये का तीर पैर में लग जाने
09:18के बाद भगवान कृष्ण ने शरीर त्याग दिया था
09:21अर्जुन ने उनका अंतिम संसकार समुद्र तट पर किया
09:24लेकिन कहा जाता है कि भगवान का हृदय धड़कता रहा जिसे अर्जुन ने भरे मन से लकड़ी के तखते पर
09:31रखकर समुद्र की लहरों में प्रवाहित कर दिया
09:38लेकिन द्वारका से हजारों किलोमीटर दूर पूरी जगनाथ तक कैसे आया भगवान का हृदय
09:47क्या नव कलेवर उद्सव में यही हृदय पुरानी से नई प्रतिमा में स्थानांतरित किया जाता है
09:54कि प्रमपरिवत्तम एक जागा को और जगागे चेंज होता है जो लकडी में महापुर्व बनता है और लकडी नस्क हो
10:08गया बाद में और दूसरा लकडी में चल गया वह में प्रमपरिवत्त
10:16क्यों अब कलेवर की रात पूरा शहर डूप जाता है अंधकार में
10:40क्योंकि उनकी कता है जो भगवान क्रिष्ण को संपूर्ण अवतार माना गया है
10:51क्योंकि उनकी कता सत्युग से शुरू होती है त्रेता युग की यात्रा करती है द्वापर में पूर्ण लीलाओं में बदलती
10:58है और कल्युग में भी जारी मानी गई है
11:01कहते हैं कि भगवान जगनाथ ही भगवान क्रिष्ण है जो कल्युग में आज भी जीवित रूप में साक्षात उपस्थित है
11:10कहीं कि ये कली जुग में जीवित भगवान है अदमी जैसे बात करते हैं आदमी जैसे खाते हैं
11:17आदमी जैसे लोक की कथा सुनते हैं वह वह भगवान भी ऐसे हैं
11:36पूरे साल में केवल 15 दिन
11:38केवल 15 दिन जब भगवान जगनाथ यहाँ पर विराजमान नहीं होते है
11:43उनको बुखार आ जाता है
11:45बुखार आ जाता है क्योंकि सनान एक आदिशी के बाद मौसम बदल रहा है
11:50और उनका तापमान बढ़ जाता है
11:52मुखार होने के कारण यहाँ पर मंदर में निवास नहीं करता है
11:55अब आप भगवान अलारनाथ को यहाँ पर देख रहे हैं
11:59यहाँ पर उनकी प्रतिमा देख रहे हैं
12:01और उनके रूप में आप भगवान जगनात के यहाँ पर दर्शन कर रहे हैं।
12:05यानि भगवान जगनात की जो यह मानव लीला है, उसका पल-पल अधुत है।
12:21जगनात भगवान रत पर सवार होकर नगर भ्रमन पर निकले है।
12:26भक्तों के लिए ये भावना और भावुक्ता दोनों का संगम है।
12:56अपने आपको भागे साली मानते हैं, हम सब परिवार आके आज प्रभु के दर्शन किये है।
13:11यात्रा शुरू होने से पहले भगवान जगनात ने स्नान पूर्णिमा के दिन 108 कलशों के जल से स्नान किया था।
13:19आनव लीला का ये सुन्दर रूप देखिए कि बदलते मौसम में इस स्नान के कारण वो बीमार पड़ गए।
13:25और 15 दिनों के लिए भगतों को उनके दर्शन प्रतिबंधित हो गए।
13:28अब ठीक हुए हैं तो रत्न जड़ित सेहासन छोड़कर खुद भक्तों से मिलने आए हैं।
13:34स्कंद पुरान में है भगवान जी का अभिरवाब दर्शन पूर्णिमा उसकी जनम तिथी उसको बोलते हैं।
13:44जनम उस चप उसी दिन हुए थे सान पूर्णिमा में।
13:48सान पूर्णिमा में जनम होकर जब नहा लिये है ज्यादा जैसे आदमी ज्यादा नहाने इसके बास उसको बुकार होता है।
13:57भगवान जगनाजी को भी बुकार है।
14:02संयोग कहिए या कुछ और जब कोविड-19 महामारी चल रही थी तब संक्रमित होने पर क्वारंटाइन पीरियड भी 14
14:09दिन का होता था।
14:10और तब हर किसी से मिलना जुलना या चूना मना होता था।
14:14अभी लोटते हैं भगवान जगनाजी की भूमी पर उनकी अद्भुत यात्रा में।
14:24भक्तों के मन में एक ही आस है।
14:27रत को चूले, रस्ती से रत दो कदम खींच ले या बस दूर से भगवान को पलभर निहार ले तो
14:33जीवन का उद्धार हो जाए।
14:50मैं इंग्लेंड से आई हूँ, ये एक अध्भुत द्रिशित है।
14:54मैंने ऐसी निष्ठा जगनाजी को लेकर कभी नहीं देखी।
15:08जो परमपरा शुरुवात से रही यानि कि 220 कारीगर ही मिलकर इस पूरे रत को तयार करेंगे, वो आज भी
15:16परमपरा चारी है।
15:17यानि कि आज आपके पास और भी विकल्प हैं, मशीने आ गई हैं, बहुत तरह की चीज़ें आ गई हैं,
15:23लेकिन उसके बावजूद वो परमपरा पूरी होनी चाहिए।
15:35भगवान की रथयात्रा कोई धार्मिक रस्म नहीं, बलकि लोगों के जीवन का हिस्सा है।
15:40रथ निर्मान से लेकर भगवान की हर सेवा का एक ऐसा अलखित विधान है, जिसका उलंगन कोई भूल से भी
15:47नहीं करता है।
15:51परमान यहां 300-200 से ज़्यादा तिंग्सों का आजपास लोग काम करते हैं।
15:55जिसे कि महा विशोगमा सेवाथ और भूई सेवाथ पिर रूपवागारें, जो रत में सब पुदाई करते हैं।
16:03पिक पित्रगारें, जो रत को कलोर करते हैं। फिर जो दरजी हैं, जो रत्यों पर कपड़ा बनता है, वो डालते
16:09हैं।
16:09इससे बिलके सब तांसे सबग मुलकें ही रत को सेयर करते हैं। फिर भगवाण जगन्नाथ की यात्रा दस दिन की
16:30होती है।
16:31जो उनकी मौसी के गुंडचा मंदिर पर जाकर समाप्त हो जाती है।
16:35इस यात्रा में उनके साथ बड़े भाई बलराम और बेहन सुभद्रा भी होती है।
16:53अब अगर बड़े भाई बलदाउ और बेहन सुभद्रा साथ हैं तो भगवान कृष्ण कहा है।
16:58और अगर जगनाथ ही कृष्ण हैं तो वो यहां इस रूप में क्यों ही।
17:02क्यों यहां भगवान न तो लड़ु गोपाल है, न राधा के कृष्ण है, न कुरुक्षेत्र के पार्थ सारत ही हैं
17:09और नहीं द्वारका धीश के रूप में हैं।
17:12क्यों यहां भगवान का रूप बिलकुल अलग है और क्यों पूरी में आकर उन्हें जगनात कहा जाने लगा।
17:19जगन्नात पुरी में एक ऐसी धार्मिक प्रता सदियों से निभाई जाती है जिसमें कहा जाता है कि भगवान जगन्नात का
17:28धड़कता ह्रिदय पुरानी प्रतिमाउं से निकालकर नई
18:00प्रतिमा में स्थाना अंतरित किया जाता है
18:02इतना टाइम लगता है चारों आदमी जाते हैं उसके अंदर में उसके अंदर में पुरा अंधकार रहते हैं एक दीप
18:12जलता है
18:14उसी में जो ब्रह्म की जो पट निकलता है उसके बाद में जो अलो की लाइटिंग होता है उसी में
18:23सब दिखाई जाता है
18:27दुनिया में केवल चार लोग हैं जो आस्था की इस अविश्वस्निय प्रक्रिया के साक्षी है जो सदियों से जीवित इश्वरी
18:33ए हृदय को प्रतिमा में स्थानांतरित करते हैं
18:36उन चार में से इन दो व्यक्तियों की बात आपने सुनी
18:39हम आगे आपको इनकी पूरी बात सुनाएंगे
18:41पहले प्रश्न ये कि हृदय कहां से आया
18:44पुराणों के अनुसार भगवान कृष्ण का हृदय
18:47उनके देहुद सर्ग के बाद भी धड़कता रहा था
18:50यही से हमें हमारी कहानी को जोडने का एक सेरा मिला
18:53जो पुरी से दूर समुद्र में ब्रह्माद्री परवत की ओर लेगा
19:03यह उडिशा की महानदी है
19:05हम महानदी तक आएं हैं यह 100 किलोमीटर की दूरी इसकी जगनातपुरी मंदर से है
19:13लेकिन द्वारका से इसकी दूरी करीब करीब
19:18धाई अजार किलोमीटर जमीनी हो जाती है
19:21द्वारका से इसकी दूरी हम क्यों दिखा रहे हैं
19:24वही इस कहानी का सबसे अध्भुत सिरा है
19:27चलिए हमारे साथ हम यहाँ पर नाव में सवार होकर आपको आगे लिए चलते हैं कहीं
19:43तो यह पूरा एरिया जब आप देखेंगे तो यह चारों तरफ पहाडियों से घिरा हुआ है
19:49वैसे तो ओडिशा जो राज्य है वो समुद्र से लगा हुआ एक राज्य है
19:54लेकिन यह एक नदी है और साथ में है एक पहाडी रेंज और इसी के साथ जब हम गुजरात के
20:00द्वारका से जुड़ती हुई कहानी यहाँ से सुनाते हैं
20:03तो उसके कई सिरे जो हैं वो अविश्वस्निय लगते हुए भी बहुत अद्भूत लगते हैं
20:15हमें बताया गया कि ब्रह्माद्री परवत की चोटी पर नील माधव की पूजा होती है
20:25जिन्हें भगवान विश्नु का अवतार माना जाता है
20:28लेकिन उस मान्यता का भगवान कृष्ण के धड़कते हृदय और भगवान जगनात के हृद्य स्थानांतरण से क्या संबंध था
20:38हम इसी सत्य की खोज में निकले
20:45सोमनात मंदर में दर्शन के दौरान वहां से डेड़ किलोमेटर करीब आगे जाकर हमें वो स्थान मिला
20:51जहां पर एक बहुत एक ऐसी कहानी लिखी हुई थी
20:55और जहां के नोग हमें ये बता रहे थे जिसके बाद हमने तै किया
21:00कि हम वहां से लगभग लगभग धाई हजार किलोमेटर दूर ये यात्रा करें उडिशन यहां पर भगवान जगनात की रत
21:13यात्रा बड़ी दूमधाम के साथ निकलती है बड़ा उच्छब मनता है
21:17भगवान जगनात के दर्शन दूर दूर से लोग आते हैं लोग आज भी मानते हैं कि ब्रह्म पदार जो है
21:23वो साक्षात भगवान जगनात में यहां है वो जीवित है जीवन्थ है
21:32लेकिन वहां खृष्ण जी अपनी नगरी गुजरात के द्वार का जो आगे सोमनात से जो कहानी जुड़ती है वहां से
21:42यहां तक का इस छोर का इस महा नदी का किस्सा जुड़ता है
21:51आज हम यहां पर इस नाओ में सवार होकर आगे की ओर जा रहे हैं तो आपको वही अधुड़त और
21:59विश्वस्मिया और कल्पिया कहानी से नाम के
22:04यह नदी का क्या नाम हुआ और यह जो पहाड़ी दिख रही है तो इसी नदी से कहते हैं कि
22:14यहां पर जो पहार है ना वहां पर सबराज लिश्वाबस्त रहते थे हैं वहां से वह नदी में नाव में
22:21यहां पर आए उपर जाके भगवान को पूछ देती अच्छा तो भग�
22:28बख्वान कहां से एय थे यहां पर भगवान द्वारिका से द्वारिका से इसी नदी से होते हूँ हान इसी नदी
22:34से तो उनका रिदयनश्ण नहीं हुआ था मूद
23:02मैं खुद कुछ समय पहले समुद्र के अंदर डुपकी लगा कर उस द्वारका के अध्भुत द्रिश्यों की साक्षी बनी थी
23:08जो समुद्र में डूप गई थी
23:19मुझे वो स्थान भी मिला जहां कहा गया कि भगवान कृष्ण देह त्याग कर स्वरगा रोहन कर गए थी
23:29यह भगवान श्री कृष्ण के देहोत सर्ग की भूमी है जहां पर आप श्री कृष्ण चरण पादु का मंदर देख
23:35रहे हैं वही जगे है जहां पर उन्होंने अपने मानव शरीर को छोड़कर वैकुंट धाम वो गए थे यहीं पर
23:43उनका शरीर कहा जाता है चुकि नदी के
23:46साथ होते हुए यह त्रिवेणी संगम में और फिर सागर में समाहित हो जाता है यह जल तो माननेता है
23:55कि यहां से जब उनका शरीर प्रवाहित किया गया तो उनका दिल जो था वो जाकर उस सागर के रास्ते
24:05से होते हुए जगनाथ पूरी तक पहुंचा
24:13हमें अब उससे आगे की कहानी जाननी थी जिसके लिए हम महांदी पार करके ब्रह्माद्री परवत तक आए
24:21यहां से सीडिया और आगे तीन नदियों का संगम है और यहां पर आगे यह सीडियों का रास्ता है इन
24:33सीडियों से उपर होकर हम उस मंदिर तक पहुंचेंगे
24:40हमें यह जानना था कि क्या नील माधव का मंदिर ही हमारी वो मिसिंग कड़ी है जो भगवान कृष्ण के
24:46जगन्नात रूप में जीवित हृदय के साथ स्थापित होने के सवालों की खोज पूरी करती है
25:03तो नाव ने जिस तट पर हमें उतारा है उसी तट से आकर लगे थे और यहां पर जब हम
25:10यहां आगे बढ़ रहे हैं इन सीडियों से तो इसी ब्रामहागिरी परवत पर आज भी पूजा होती है
25:19लेकिन एक समय पर उसकी मानेता ही अलग थी
25:22पूजारी जी से हमने ये जानने की कोशिश की कि क्या यहीं इसी नदी के तट पर आकर भगवान कृष्ण
25:28का जीवित हृदय लगा था
25:32नेल माधो को फर्स्ट ब्रह्माजी पुजा कर रहते है यहां पर एक हजार बर्ष ब्रह्माजी के बाद में पृथुराजा पुजा
25:40कर थे ले
25:41पृथुराजा के बाद में नारद मुनी पुजा कर थे ले नारद मुनी के बाद में आमार जो विश्वाबशी सबर यहां
25:49पर पुजा कर थे विश्वाबशी का बाद हम लोग कडी जुग में ब्रह्मान का रूप में यहां पर पुजा कर
25:56थे
26:20तो ईनका पंचु पांडघ कुष्णा अंतिन संस्कुश citoy,
26:33तो उनके लिए उनके प्रसान्द महासागर उनके फिंगा देज़ादा है।
26:54हमें पुजारी जी से जो पता चला वो इस प्रकार था
26:58नील माधव सत्युग से भगवान विश्णु के रूप में पूजे जाते थे
27:02लेकिन उनकी पूजा आदिवासी विश्व वसु किया करते थे
27:06वहां आदिवासीों के अलावा किसी और की उपस्थिती निशेद थी
27:11वर्तमान मध्य प्रदेश के प्राचीन महाजनपद अवंतिका के राजा इंद्र द्युम्न भगवान विश्णु के भक्त थे
27:17उन्हें जब ये पता चला तो उन्होंने अपने विश्वस्त विद्यापती को पता लगाने के लिए भेजा
27:24विद्यापती ने अदिवासी मुखिया विश्वसु की बेटी से विवाह कर लिया और फिर आग्रह किया कि उन्हें नीलमाधव के दर्शन
27:31करवाए जाएं
27:32पहले विश्वसु ने मना किया लेकिन बेटी के कहने पर वो विद्यापती की आँखों पर पट्टी बांध कर ले गए
27:40विद्यापती ने रास्ते में सर्सों के दाने गिरा दिये जिनमें बाद में फूल निकल आए
27:50विद्यापती ने राजा इंद्र द्युम्न को सारी बात बताई
27:53तो राजा रास्ता देखते हुए मंदिर पहुँचे
27:57लेकिन वहां से नील माधव अंतर ध्यान हो चुके थे
28:29विद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्युद्य
28:31माता सृदवी बूदे शृदवी उना दुरुन दोनो
28:33चरन में और इसले भगवान जी काब
28:35लो चरन में गंगा मा जैसा हमाँ शरीष से परशिना
28:38निकलता है बिंदु बिंदु आकर से लगवान जी
28:41पाउच चरन का छोटा अंगुली चरन काणी अंगुली ईनका
29:03इससे आगे की कहानी सकंद पुराण, नारद पुराण और ब्रह्म पुराण में मिलती है
29:10सकंद पुराण के पुरुषोत्तम क्षेत्र महात्मे खंड में बताया गया है कि भगवान नील माधव के दर्शन न हो पाने
29:17के कारण राजा इंद्र द्युम्न निराश हो गये
29:19लेकिन तभी उन्हें ये आकाश्वाणी सुनाई दी कि अब नील माधव के दर्शन उन्हें पुरी के तट पर लकणी के
29:26लठे के अंदर हूँग
29:30भगवान जी कली जूग में दारु का रुप ले लिया हूँ पुरी में तो इधर चाट जूग का ठकुरी ही
29:35सथ्थय जूग द्यजूग जप्पर्शन वन्हें ये पहला जूग ही जो भगवान जी निल माधव सथ्थय जूग का है नील यानी
29:43जगनाथ महायनी सुवद्रा
29:47भगवान जी बोले देजे में कली जुग में दारू के रूप में दर्शन दूगा
29:50और स्वाई भक्त लोग भी दर्शन दूगा
29:52इसलिए भगवान जी जगन्नात बला देज शुगाद रायित्तिनों पूरी में लिला करें
30:10दारू का मतलब लकडी का लठा ही होता है
30:13जो एक दिन राजा को समुद्र में तैरते हुए दिखा
30:16उस पर शंख कमल गदा के चिन्ध बने हुए थे
30:19मान्यता है कि यही वो लकडी थी जिस पर भगवान कृष्ण का रिदय रखा था
30:25राजा ने तै किया कि वो इसी लकडी से भगवान की प्रतिमा बनवाई है
30:29माना जाता है कि भगवान विश्व कर्मा कारीगर के रूप में
30:33वहां खुद आए और एक कीस दिन का समय मांगा मूर्तियां बनाने के लिए
30:37लेकिन शर्त रखी बीच में कोई दर्वाजा नहीं खोलेगा
30:46राजा की पत्नी ने पंद्रह दिन बाद ही कौतूहल वश दर्वाजा खोल दिया
30:51विश्व कर्मा रूप में भगवान कृष्ण अंतर ध्यान हो गए
30:55हृदय सहित तब तक कृष्ण बलराम सुभद्रा की अधूरी प्रतिमाय बन चुकी थी
31:00राजाइंद्र द्युम्न भगवान विश्णू के उपासक थे
31:03तो उन्होंने भगवान विश्णू के नाम पर ही जगनात यानि सारे जगत के नात के रूप में प्रतिमाय उसी स्थिती
31:12में स्थापित करवा दी
31:13ये प्रतिमाय लकडी की थी इने दारु ब्रह्म यानि लकडी से निर्मित भगवान भी कहा जाता है
31:19पवित्र तिथी में भगवान का नव कलेवर उत्सब होता है
31:27नव कलेवर का अर्थ होता है नव यानि नया कलेवर यानि शरीर यानि भगवान के नया शरीर धारण करने का
31:35उत्सब
31:36यह जो नबकलवल की जो रिती है ओ रामनव하 हमी का बाद जो दष्यमी आता है चैतिरो दश्यमी तिति च
31:47हो शुरू होता है उच्छार मैना चलता है नोगल
31:52दो मैना जो लकडी जंगल से लाने के लिए जाते हैं, दो मैना रज्जात्रा होता है।
32:01दो मैना क्या होता है? 15 दिन पुराना भगवान को स्नान मंडप में स्नान कराते हैं, वो बुकार में पड़ते
32:11हैं, फिर 15 दिन बनाने के लिए नया भगवान को लाते हैं
32:16भगवान की प्रतिमाएं जब नई प्रतिमाओं में बदली जाती हैं तब कहा जाता है कि भगवान कृष्ण का जो जीवित
32:23हृदय था वो इसी समय नई प्रतिमाँ में स्थानांतरित किया जाता है
32:27इस प्रक्रिया को ब्रह्म परिवर्तन या ब्रह्म स्थापन कहते हैं
32:40साथ बिस्व का मलिक आ पर शजयो का प्रतिकी रूप शजयो हो दो तह सारा भिस्व का सक्ति राधार महाद्मर
32:52परिवर्तन क्या ओरता हैं यह तो बुलना ने शक्ति नहीं है
32:58जो दैतापती बंस में जो जनम हुए है हमारा सबसे end का काम है लास्ट का काम है भगवान जगनाजी
33:07का ब्रह्म का परिबरतन करने के लिए उसको change करेंगे उसको नहाएंगे उसको बाद में फिर नुतन भगवान की शरीर
33:18में उसको स्थापन करने के लिए
33:22ब्रह्म स्थापन की प्रक्रिया को न कोई देख सकता है और नहीं किसी को आजीवन बता सकता है
33:30राम अप्तर में जो बाली को मार रहे थे सिवडी लटा जो है वो एक पेड़ था पेड़ के पिछे
33:39रेकर बाली को तीर मारा चुपके
33:43उसी टाइम भावन बाली को कहा मैंने आपको चुपके जब सर मरा इसके पर आप भी मुझे मारेंगे ज़रोगा
33:53जब भवान का किष्ट जन्म हुआ, किष्ट जन्म के अवतर में बाली ने भवान को सर मरा
34:02उस टाइम भवान ने किष्ट ने उनको याद दिला दिये जो बाली का जो अवतर था, जो राम अवतर था
34:10उस टाम का याद दिला दिये
34:13ब्रह्म स्थापन की प्रक्रिया को प्रमुक सेवकों जिन्हें दैतापती कहा जाता है
34:18उनके हाथों से संपन्न कराया जाता है और पीड़ी दर पीड़ी ये लोग ही ब्रह्म स्थापन की प्रक्रिया को पूरा
34:25करवाते हैं
34:26दैतापती दरसल आदिवासी राजा विश्वावसू के वन्शज कहे जाते हैं
34:31और भगवान को छूने का अधिकार हजारों वर्षों से उन्हें ही प्राप्त है
34:35प्रक्रिया के दौरान क्या होता है ये आज तक कभी किसी को पता नहीं चल पाया
34:56पर किसी से बोलने ही सकते हैं?
35:11आप छोग क देखते हैं?
35:17आप देखते हैं?
35:20पर क्या होता है किसी से नहीं आप परनेंडा गर सते हैं?
35:23अब कहां से बोलेगा बहुत कमर खित हो जाएगा अच्छा इसलिए बोलेगा वो तो गुप्त कता है उसको बोलना नहीं
35:34है
35:35भगवान की पुरानी प्रतिमाओं को मंदर के अंदर ही एक हिस्से में समाधी दे दि जाती है जिसकी प्रक्रिया भी
35:42ये दैता-पती सेवक भी पूरी करते हैं
35:44हमारा जो है मत्यमंडल में देहवई मनें जो मत्यमंडल में जन्म होता है तो देवता होले भी मरता है जैसे
35:54आदमी मरते हैं भगवान भी शरीद क्याक करते हैं जब जोड़ा असार का मैना पड़ेगा तो उनीस साल में हो
36:03सकते हैं बारा साल में हो सकते हैं जब पड़ेगे जो
36:14परिवार है जीसे अब की घर में कोई मर जाएंगे तो मंढन ओगरा अब जैसे करते हैंème
36:23विधी जाते हैं अमेरा मार्क siitä पुष्करिन हैं वह जाते हैं जल उसको देते हैं ृठ यू आते हैं
36:44और उन्ही के स्मरण से अपने दिन की शुरुवात करते हैं
36:51भगवान जगन्नात के धाम आकर चार युगों की कथा पूरी होती है
37:01सत्युग से नील माधव की मान्यता का सिरा
37:05त्रेता में भगवान राम ने बाली का छुप कर संहार किया था
37:09द्वापर में जब बहेलिय ने भगवान कृष्ण पर छुप कर तीर चलाया तो बहेलिय ने क्षमा मांगी
37:15तब धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण ने उसे त्रेता युग के कर्म फल की याद दिलाई
37:22ब्रह्म को कोई दिखना नहीं चाहिए
37:24ब्रह्म इसे स्वरुप है जो की वो पूरा ब्रह्मान का विश्व है इसलिए उनको अंधेरे में कोई आएगा लाकर भवान
37:35के अगली एक स्वरुप में रखेगा
37:37और जो पुराना स्वरुप है बजगना जी का उनको पाताली क्या जाएगा मंदर के अंदर
37:54कल युग में भगवान क्रिष्ण जगनात पूरी में भगवान जगनात रूप में विराजमान माने जाते है
38:03सनातन धर्म के चार प्रमुख तीर्थ हैं उनमें बदरीनाथ रामेश्वरम द्वारका के साथ जगनात पूरी शामिल है
38:10युगों और सदियों के अंदराल में निश्चित है कुछ कडिया खो जाएं लेकिन कुछ तस्वीरें ऐसी होती हैं जो सारी
38:18कहानी एक प्रेम में सुना देती
38:22नील माधव मंदिर में हमने एक तस्वीर देखी थी जिसमें स्पष्ट हो रही थी भगवान कृष्ण से लेकर जगनात तक
38:30की याक्रा
38:31इस तस्वीर को ध्यान से देखीए भगवान कृष्ण के हृदय स्थान से एक प्रकाश निकल रहा है और नीचे भगवान
38:39जगनात मंदिर की प्रतिमाएं दर्शाई गई
38:42मान्यताएं भी यही कहती हैं कि भगवान कृष्ण का हृध्य ही भगवान जगन्नात की प्रतिमामे स्थित है
38:50यानि द्वारका से जगन्नात मंदिर के बीच का केंद्र नील माधव मंदिर को कहा जा सकता है
38:56धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण एक समय अपने भाई बलराम और वेहन सुभग्रा के साथ पूरी भ्रमन पर आये
39:04थे और जन्ता ने उनका स्वागत किया था
39:07कहते हैं रध्यात्रा के माध्यम से वो युगो पुरानी परंपरा आज भी जीवित है लोगों का विश्वास तो यहीं है
39:14इस विश्व में असंख्य रंग और हर रंग भगवान के इसलिए तो हमारे आज के अद्भूत विश्वस्निय अकल्पनिय में आपको
39:36इतने रंग दि
39:36जिन्हें समेट कर हमने आपके सामने प्रस्तूत करने का प्रयास किया है अभी के लिए इतना ही अभिशेक सिंग अजे
39:46कुमार नात और कैमर परसन हितेश कुमार के साथ मुझे दीजे इजाज़त देश और दुनिया की बाकी खबरों के लिए
39:52आप देखते रहिए आज तक
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