00:06मुझे तो पूरी दुनिया से बात करनी है
00:08इसलिए मैं तो वास्तव में यही चाहूंगा कि मेरे सामने और भी विविध प्रकार के लोग हो
00:13लेकिन सामने कोई भी बैठा हो, मेरा काम वही रहता है
00:17प्रश्न बदल जाते हैं, प्रश्नों का रंग रूप बदल जाता है
00:31हम तो उस मूल बीज की बात कर रहे हैं, जिसे आप मनुष्य होने का सार कह सकते हैं
00:36मैं पहले भी अनेक देशों के लोगों से समवाद कर चुका हूँ
00:40और मैंने पाया है कि मूल प्रश्न बदलते नहीं है
00:42ऐसा नहीं है कि किसी जर्मन महिला का प्रश्न अपनी जड में किसी उत्तर भारतिय पुरुष के प्रश्न से अलग
00:51होगा
00:52हाँ, उसका स्वरूप अलग होगा, शब्द अलग होगे, उसका रंग धंग अलग होगा
00:57लेकिन जिस सोर से वो प्रशन उठ रहा है वो सोर सलग नहीं होता भारत के भीतर ही इतनी विविधता
01:03है एक और समाज की उची सीड़ी पर बैठा हुआ संपन पुरुष हो सकता है और दूसरी और समाज के
01:11बिलकुल निचले पायदान से आने वाली एक निर्धन आदिवासी मह
01:17मिला यह भी बहुत बड़ा अंतर है और ऐसे लोग मेरे सत्रों में आते भी हैं जहां तक प्रश्न वास्तव
01:24में प्रश्न करता के लिए महत्वपूर्ण है उसे पूछा जा सकता है
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